23 सितम्बर
संकल्प दिवस
1917 में गुजरात के वडोदरा शहर में नौकरी करने आयें बाबा साहब को रहने के लिये मकान नहीं मिला, पारसी धर्मशाला में रूकना पड़ा, वहां से भी निकाल दियें गयें।
धर्मशाला में से बेईज्जत करकें धक्कें मारकें निकाल दिया।
और बाबा साहब को जब मुंबई वापिस जाना था तब गाड़ी (रेलवेे) समय के मुताबित 05 घंटा देरी से चल रही थी, तब एक पास ही कमाटी बाग था, वहां पर बाबासाहब अपने साथ हुयें अन्याय को याद करकें रोयें।
बाद मे संकल्प किया कि मुझे और मेरे समाज को इन्हीं जातियों के कारण अपमानित होना पड़ रहा है अब मैं जातियों को ही खत्म कर दूंगा और समान अधिकारो को प्राप्त करुंगा।
उन्होंने 23-09-1917 को जातियाँ तोड़कर एक समतामूलक समाज बनाने का संकल्प इसी दिन लिया।
आओं आज बाबा साहब को नमन करें, याद करें।
महामानव को कोटि-कोटि नमन।
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जय भीम जय भारत जय संविधान।